देहरादून में फिर गूंजेंगे 1952 की टिहरी के रामलीला संवाद, आधुनिक तकनीक के बीच दिखेगी पुरानी परंपरा
देहरादून। वक्त बदल गया, मंच सजाने के तरीके बदल गए, लेकिन 1952 की टिहरी की रामलीला की आत्मा आज भी वही है। इसी ऐतिहासिक विरासत को जीवंत करने के लिए रेसकोर्स स्थित श्री गुरु नानक मैदान में कलाकार इन दिनों पारंपरिक संवादों, काव्य पाठ और पुराने अभिनय अंदाज का अभ्यास कर रहे हैं। श्री रामकृष्ण लीला समिति टिहरी की यह पहल दर्शकों को पुरानी टिहरी की सांस्कृतिक स्मृतियों से जोड़ने की तैयारी है।
इस बार रामलीला में आधुनिक तकनीक और पारंपरिक कला का अनूठा संगम देखने को मिलेगा। मंच पर लेजर लाइट, डिजिटल स्क्रीन, आधुनिक साउंड सिस्टम और लाइव प्रसारण की व्यवस्था होगी, लेकिन कलाकारों की प्रस्तुति में ऐतिहासिक रामलीला की मूल शैली बरकरार रखी जाएगी। तबला, हार्मोनियम और बांसुरी की संगत के बीच कलाकार पुराने संवादों और काव्य पाठ को उसी अंदाज में साधने में जुटे हैं, जिसने इस रामलीला को विशिष्ट पहचान दिलाई।
21 साल बाद देहरादून में लौटी थी ऐतिहासिक रामलीला
समिति के अध्यक्ष अभिनव थापर के अनुसार, 21 वर्ष के अंतराल के बाद वर्ष 2023 में देहरादून में इस रामलीला को फिर से शुरू किया गया था। अब इसे पहले से अधिक व्यापक स्तर पर आयोजित करने की तैयारी है। समिति का प्रयास है कि नई पीढ़ी को टिहरी की सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराने के साथ ही इस ऐतिहासिक प्रस्तुति को देश-दुनिया के दर्शकों तक पहुंचाया जाए।
डिजिटल माध्यमों से 82 लाख से अधिक लोगों तक पहुंची रामलीला
पिछले वर्ष डिजिटल माध्यमों के जरिए रामलीला को 82 लाख से अधिक दर्शकों ने देखा था। इस बार समिति ने आधुनिक तकनीक और व्यापक लाइव प्रसारण के माध्यम से एक करोड़ से अधिक दर्शकों तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है।
समिति के सचिव एवं निर्देशक अमित पंत ने बताया कि कलाकार मूल स्क्रिप्ट के अनुरूप पारंपरिक संवादों और काव्य पाठ का नियमित अभ्यास कर रहे हैं। अभ्यास के दौरान समिति अध्यक्ष अभिनव थापर, गढ़वाली गायिका शिवानी नेगी, अनिल नौटियाल, देवेंद्र नौडियाल, मयंक पांडे, तपेंद्र चौहान और विवेक तिवारी सहित अन्य लोग मौजूद रहे।
11 से 21 अक्टूबर तक होगा मंचन
श्री रामकृष्ण लीला समिति टिहरी की रामलीला का मंचन 11 से 21 अक्टूबर तक किया जाएगा। कार्यक्रम के तहत 16 अक्टूबर को सीता हरण, 20 अक्टूबर को रावण वध के बाद रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन होगा। वहीं, 21 अक्टूबर को श्रीराम के राजतिलक के साथ रामलीला का समापन किया जाएगा।
डिजिटल पर्दों, आधुनिक रोशनी और बेहतर ध्वनि व्यवस्था के बीच इस बार भी सबसे खास आकर्षण 1952 की टिहरी से जुड़ी वही पारंपरिक शैली होगी। समिति की कोशिश है कि तकनीक प्रस्तुति को भव्य बनाए, लेकिन उस विरासत की पहचान न बदले, जिसके संरक्षण के लिए इस रामलीला को फिर से मंच पर उतारा गया है।


