ऋषिकेश में टीबी मरीजों का इलाज भगवान भरोसे! तीन साल से विशेषज्ञ डॉक्टर का इंतजार, 510 मरीजों की बढ़ी मुश्किलें

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ऋषिकेश। देश को टीबी मुक्त बनाने के लिए सरकार की ओर से अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन तीर्थनगरी ऋषिकेश में स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बड़ी कमी इस मुहिम पर सवाल खड़े कर रही है। राजकीय उप जिला चिकित्सालय परिसर में संचालित क्षय रोग केंद्र में पिछले तीन साल से टीबी विशेषज्ञ डॉक्टर की तैनाती नहीं हो पाई है। हालात यह हैं कि करीब 510 पंजीकृत मरीजों की देखभाल की जिम्मेदारी अब फार्मासिस्ट और लैब टेक्नीशियन के भरोसे है।

डॉक्टर का पद खाली, वैकल्पिक व्यवस्था भी ठप

टीबी सेंटर में विशेषज्ञ चिकित्सक का पद वर्ष 2022 से रिक्त है। इतने लंबे समय बाद भी स्थायी तैनाती नहीं होने से मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हो रही हैं। पहले हिमालयन अस्पताल, जौलीग्रांट के रेजीडेंट डॉक्टरों के माध्यम से किसी तरह काम चलाया जा रहा था, लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनके भी केंद्र में नहीं आने के कारण मुश्किलें और बढ़ गई हैं।

अब केंद्र पर पहुंचने वाले मरीजों को विशेषज्ञ परामर्श के लिए दूसरे डॉक्टरों की ओपीडी का रुख करना पड़ रहा है। इससे न केवल मरीजों को परेशानी उठानी पड़ रही है, बल्कि टीबी के उपचार और नियमित निगरानी की व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं।

510 मरीज पंजीकृत, रोजाना पहुंच रहे नए संदिग्ध

केंद्र में वर्तमान में करीब 510 टीबी मरीज पंजीकृत हैं। इनमें मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट (एमडीआर) टीबी से पीड़ित मरीज भी शामिल हैं। ऐसे मरीजों के उपचार में नियमित चिकित्सकीय निगरानी, जांच और दवाओं के उचित प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

इसके अलावा प्रतिदिन पांच से दस नए संदिग्ध मरीज खांसी, बुखार और बलगम की जांच कराने के लिए केंद्र पहुंचते हैं। डॉक्टर की अनुपस्थिति में इन मरीजों को जनरल फिजिशियन की ओपीडी में भेजा जा रहा है। इससे मरीजों को लंबी कतारों में इंतजार करना पड़ता है और समय पर चिकित्सकीय परामर्श मिलने में भी दिक्कतें आती हैं।

जनरल ओपीडी में भी डॉक्टर की कमी

सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि टीबी मरीजों को जिस जनरल फिजिशियन की ओपीडी में भेजा जा रहा है, वहां भी पिछले तीन महीने से फिजिशियन उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर (ईएमओ) ही मरीजों की जांच कर रहे हैं।

एक तरफ टीबी सेंटर में विशेषज्ञ नहीं है, तो दूसरी तरफ वैकल्पिक उपचार व्यवस्था भी डॉक्टरों की कमी से जूझ रही है। ऐसे में मरीजों को राहत मिलने के बजाय उन्हें एक ओपीडी से दूसरी ओपीडी तक भटकना पड़ रहा है।

संक्रमण का खतरा, अलग व्यवस्था की जरूरत

टीबी एक संक्रामक बीमारी है, जो मुख्य रूप से हवा के माध्यम से फैलती है। ऐसे में संदिग्ध और संक्रमित मरीजों को सामान्य मरीजों, बच्चों और बुजुर्गों के साथ लंबी कतारों में खड़ा रखना संक्रमण नियंत्रण की दृष्टि से चिंता का विषय है। अस्पताल में मरीजों की जांच और परामर्श के लिए उचित व्यवस्था होना जरूरी है, ताकि संक्रमण के जोखिम को कम किया जा सके।

टीबी मुक्त भारत के लक्ष्य के बीच बड़ा सवाल

सरकार टीबी उन्मूलन के लिए जांच, उपचार और मरीजों की नियमित निगरानी पर जोर दे रही है। इसके बावजूद ऋषिकेश जैसे प्रमुख तीर्थस्थल के सरकारी अस्पताल में तीन साल से विशेषज्ञ डॉक्टर का पद खाली रहना व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।

अब जरूरत केवल रिक्त पद भरने की नहीं, बल्कि टीबी सेंटर में नियमित चिकित्सकीय सेवाएं बहाल करने, एमडीआर मरीजों की निगरानी सुनिश्चित करने और संदिग्ध मरीजों के लिए सुरक्षित जांच व्यवस्था उपलब्ध कराने की भी है। देखना होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस समस्या को दूर करने के लिए कब ठोस कदम उठाता है और मरीजों को कब तक विशेषज्ञ डॉक्टर की सुविधा मिल पाती है।

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