तराई-कुमाऊं में बाघ, गुलदार और हाथियों का कहर, 17 लोगों की मौत
देहरादून : उत्तराखंड के तराई और कुमाऊं क्षेत्र में मानव-वन्यजीव संघर्ष लगातार गंभीर रूप लेता जा रहा है। वर्ष 2024 से 2026 के बीच बाघ, गुलदार और हाथियों के हमलों में अब तक 17 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि कई अन्य लोग घायल हुए हैं। लगातार बढ़ रही इन घटनाओं ने वन विभाग, प्रशासन और स्थानीय ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है।
जानकारी के अनुसार तराई क्षेत्र के जंगलों से सटे गांवों और कुमाऊं मंडल के कई इलाकों में जंगली जानवरों की आवाजाही बढ़ गई है। बाघ और गुलदार अक्सर आबादी वाले क्षेत्रों में घुसकर मवेशियों के साथ-साथ इंसानों पर भी हमला कर रहे हैं, वहीं हाथियों के झुंड खेतों और गांवों में घुसकर भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं।
वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार बीते दो वर्षों में सबसे अधिक घटनाएं नैनीताल, उधमसिंह नगर, चंपावत, अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ जिलों में सामने आई हैं। कई स्थानों पर ग्रामीणों ने वन्यजीवों के डर से शाम ढलते ही घरों में कैद रहने को मजबूर होने की बात कही है। किसानों की फसलें भी हाथियों के झुंड द्वारा लगातार नष्ट की जा रही हैं, जिससे आर्थिक नुकसान बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जंगलों का सिकुड़ता दायरा, वन क्षेत्रों में मानवीय हस्तक्षेप, भोजन और पानी की कमी तथा वन्यजीव गलियारों पर अतिक्रमण इस संघर्ष का मुख्य कारण है। जंगलों से भोजन की तलाश में जानवर आबादी की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे टकराव की घटनाएं बढ़ रही हैं।
वन विभाग ने संवेदनशील क्षेत्रों में गश्त बढ़ाने, ट्रैंकुलाइज टीमों को सक्रिय करने, चेतावनी तंत्र मजबूत करने और ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए अभियान शुरू किया है। साथ ही हाथियों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में सोलर फेंसिंग, निगरानी कैमरे और त्वरित राहत सहायता देने की योजना पर भी काम किया जा रहा है।
ग्रामीणों ने सरकार से मांग की है कि प्रभावित परिवारों को शीघ्र मुआवजा दिया जाए और वन्यजीव हमलों को रोकने के लिए स्थायी समाधान निकाला जाए। लगातार बढ़ती घटनाओं ने साफ कर दिया है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो मानव-वन्यजीव संघर्ष आने वाले समय में और भी बड़ा संकट बन सकता है।
