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पिथौरागढ़: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र, विशेषकर पिथौरागढ़ की व्यास घाटी में जलवायु परिवर्तन के गंभीर संकेत साफ दिखाई देने लगे हैं। हालिया अध्ययन में सामने आया है कि बढ़ते तापमान ने यहां की प्राकृतिक ऋतुचक्र को प्रभावित कर दिया है। जहां पहले महीनों तक जमी रहने वाली बर्फ अब समय से पहले पिघल रही है, वहीं वसंत का आगमन भी तय समय से पहले होने लगा है।

शोधकर्ताओं के अनुसार घाटी में औसत तापमान में लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जिसका सीधा असर वनस्पतियों पर पड़ रहा है। पहाड़ों की ढलानों पर हरियाली सामान्य से कई सप्ताह पहले दिखाई देने लगी है। पहली नजर में यह सकारात्मक बदलाव लगता है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पारिस्थितिक असंतुलन का संकेत है।सबसे ज्यादा असर औषधीय पौधों पर पड़ा है। व्यास घाटी जड़ी-बूटियों की समृद्ध विविधता के लिए जानी जाती रही है, लेकिन तापमान बढ़ने और बर्फबारी घटने से इनकी उत्पादकता में कमी आ रही है। कई पारंपरिक प्रजातियां या तो ऊंचाई की ओर खिसक रही हैं या धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर पहुंच रही हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि पहले जिन क्षेत्रों में भरपूर औषधीय पौधे मिलते थे, अब वहां उनकी संख्या काफी घट गई है।

अध्ययन में यह भी सामने आया कि सर्दियों की अवधि लगातार छोटी होती जा रही है। पहले जहां नवंबर से मार्च तक कड़ाके की ठंड और भारी हिमपात होता था, अब बर्फबारी कम और अनियमित हो गई है। इससे न केवल जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं, बल्कि ग्लेशियरों पर भी दबाव बढ़ रहा है। बर्फ जल्दी पिघलने से शुरुआती गर्मियों में तो पानी अधिक दिखता है, लेकिन बाद के महीनों में जलसंकट गहराने लगता है।

जलवायु परिवर्तन का असर खेती पर भी दिखने लगा है। तापमान बढ़ने और नमी के पैटर्न बदलने से फसलों में कीटों का प्रकोप बढ़ रहा है। जिन कीटों को पहले ठंडा मौसम नियंत्रित रखता था, वे अब अधिक समय तक सक्रिय रहकर फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। स्थानीय किसानों को नए प्रकार के रोग और कीट देखने को मिल रहे हैं, जिससे पारंपरिक खेती की व्यवस्था चुनौती में है।

वन्यजीवों के व्यवहार में भी बदलाव दर्ज किया गया है। कई प्रजातियां अपने पारंपरिक आवास छोड़कर नई ऊंचाइयों या नए इलाकों की ओर बढ़ रही हैं। इससे भोजन श्रृंखला और जैव विविधता पर असर पड़ रहा है। कुछ पक्षी और जानवर अब अलग समय पर दिखाई देते हैं, जो उनके प्रजनन चक्र और प्रवास पैटर्न में बदलाव का संकेत है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यही रुझान जारी रहा तो हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन और अधिक बिगड़ सकता है। इसका असर केवल पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मैदानी क्षेत्रों के मौसम, जल उपलब्धता और कृषि पर भी पड़ेगा।

विशेषज्ञ स्थानीय स्तर पर अनुकूलन (एडॉप्टेशन) की रणनीतियां विकसित करने, पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक शोध के साथ जोड़ने और संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में अंधाधुंध विकास गतिविधियों पर नियंत्रण की जरूरत बता रहे हैं। उनका कहना है कि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो व्यास घाटी जैसी नाजुक हिमालयी घाटियां जलवायु परिवर्तन की सबसे बड़ी कीमत चुकाने को मजबूर होंगी।

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