उत्तराखंड हाईकोर्ट का अहम फैसला
नैनीताल/देहरादून: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सेना के एक जवान के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म और अपहरण का मामला रद्द कर दिया है। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि यदि दो वयस्कों के बीच संबंध आपसी सहमति से स्थापित हुए हों, तो बाद में विवाह से इनकार करना स्वतः दुष्कर्म की श्रेणी में नहीं आता।
मामला उस समय दर्ज हुआ था जब एक युवती ने आरोप लगाया कि सेना के जवान ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए और बाद में विवाह से इनकार कर दिया। साथ ही अपहरण की धाराएं भी लगाई गई थीं। इस पर संबंधित थाने में भारतीय दंड संहिता की धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था।आरोपी जवान की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई। याचिका में कहा गया कि दोनों के बीच संबंध आपसी सहमति से थे और युवती बालिग थी। यह भी दलील दी गई कि किसी भी स्तर पर जबरदस्ती या दबाव का प्रमाण नहीं है।
मामले की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने कहा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि दोनों पक्ष बालिग थे और उनके बीच संबंध सहमति से बने। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी संबंध में शुरू से ही धोखाधड़ी या झूठे वादे का ठोस प्रमाण न हो, तो केवल शादी न करना दुष्कर्म का आधार नहीं बन सकता।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि “विवाह का वादा” तभी दुष्कर्म माना जा सकता है जब यह साबित हो कि आरोपी का शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं था और उसने केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए झूठा आश्वासन दिया हो। सभी तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दुष्कर्म और अपहरण की धाराओं में दर्ज एफआईआर को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले में आपराधिक मुकदमे को जारी रखना न्यायोचित नहीं होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला ऐसे मामलों में मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है, जहां सहमति से बने संबंधों को बाद में आपराधिक रंग दिया जाता है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रत्येक मामला अपने तथ्यों के आधार पर परखा जाएगा।इस निर्णय के साथ ही सेना के जवान को बड़ी राहत मिली है।
