ऋषिकेश में दशम पंचाग्नि विद्या साधना की पूर्णाहुति, संतों की मौजूदगी में हुआ साधु भंडारा
ऋषिकेश : परम पूज्य अवधूत गुरुदेव स्वामी समर्पणानन्द सरस्वती जी महाराज के दिव्य सान्निध्य में 15 जनवरी से 15 जून 2026 तक संचालित दशम पंचाग्नि विद्या साधना की पावन पूर्णाहुति वैदिक मंत्रोच्चार, श्रद्धा और भक्ति के वातावरण में संपन्न हुई। इस अवसर पर आयोजित विशाल साधु भंडारे में देशभर के विभिन्न आश्रमों, पीठों और आध्यात्मिक संस्थानों से जुड़े संत-महात्माओं, योग साधकों और श्रद्धालुओं ने बड़ी संख्या में भाग लिया।
कार्यक्रम में कैलाश आश्रम, शिवानन्द आश्रम, ब्रह्मानन्द आश्रम, क्रिया योग आश्रम, योगशाला आश्रम, मेहिन्द आश्रम, आनन्द आश्रम, राजस्थान आश्रम तथा स्वर्गाश्रम कुटिया सहित कई प्रतिष्ठित संस्थानों के संत उपस्थित रहे। योगश्री पीठ के महामंडलेश्वर स्वामी मृत्युञ्जय तीर्थ जी महाराज, स्वामी ब्रह्मानन्द जी महाराज, स्वामी शंकराचार्य जी महाराज और स्वामी ओंकारानन्द जी महाराज सहित अनेक संतों एवं विद्वान आचार्यों ने अपने आशीर्वचन प्रदान किए।
इस अवसर पर वक्ताओं ने पंचाग्नि विद्या साधना को सनातन वैदिक परंपरा की अत्यंत कठिन और उच्चकोटि की तपस्या बताते हुए कहा कि यह साधना आत्मशुद्धि, आत्मानुशासन, वैराग्य और ब्रह्मचिंतन का प्रतीक है। इसका उद्देश्य केवल अग्नि के मध्य तप करना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसी विकृतियों का दहन कर आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होना है।
संतों ने कहा कि पांच माह तक चली इस कठिन साधना के माध्यम से साधक अपने जीवन को सेवा, साधना और समर्पण के मार्ग पर स्थापित करता है। वैदिक ऋषि परंपरा से प्राप्त यह साधना विश्वकल्याण, प्रकृति संतुलन और मानवता के उत्थान के लिए समर्पित मानी जाती है।
आयोजन की सफलता में आश्रम के योगाचार्यों, सेवाव्रती भक्तों और सहयोगियों का विशेष योगदान रहा। योगिनी अनामिका देवी, कपिल बिष्ट, गीता बिष्ट, पूर्व प्रधान भगवान सिंह पुंडीर, देवराज भट्ट, रमेश भट्ट, भावना भट्ट, उज्जला, आदित्य, सोमा, हरिश, पंडित पुरुषोत्तम, कुंजापुरी पीठ के सचिव नंदू भंडारी सहित देश-विदेश से जुड़े कई श्रद्धालुओं ने सेवा कार्यों में सक्रिय सहभागिता निभाई।
समारोह के अंत में उपस्थित संतों, आचार्यों और श्रद्धालुओं ने विश्वशांति, मानव कल्याण और आध्यात्मिक जागरण की कामना करते हुए इस पावन साधना की पूर्णाहुति पर गुरुदेव के तप, त्याग और समर्पण की सराहना की। संतों ने इसे वर्तमान समय में वैदिक तपस्या और गुरु-शिष्य परंपरा के पुनर्स्थापन का प्रेरणादायी उदाहरण बताया।
