पर्यावरण और वन्यजीवों पर बढ़ा खतरा
देहरादून : उत्तराखंड में आधिकारिक फायर सीजन शुरू होते ही जंगलों में आग की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। महज दो दिनों के भीतर राज्य में 80 से अधिक फायर अलर्ट जारी हुए हैं और अब तक करीब 42 हेक्टेयर वन क्षेत्र आग की चपेट में आ चुका है। सर्दियों में सामान्य से कम बारिश होने के कारण जंगलों में नमी का स्तर घट गया है, जिससे आग तेजी से फैलने का खतरा बढ़ गया है।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार, इस वर्ष सर्दियों में अपेक्षित वर्षा नहीं होने से जंगलों में सूखी पत्तियां और घास बड़ी मात्रा में जमा हैं। यही कारण है कि छोटी सी चिंगारी भी बड़े आगजनी हादसे का रूप ले सकती है। विशेष रूप से चीड़ के जंगलों में गिरने वाली सूखी सुइयां (पिरूल) आग को तेजी से फैलाने में अहम भूमिका निभाती हैं।
राज्य आपदा प्रबंधन और वन विभाग के नियंत्रण कक्ष को फायर सीजन के शुरुआती दो दिनों में 80 से ज्यादा अलर्ट प्राप्त हुए। इन अलर्ट के आधार पर फील्ड टीमों को तुरंत मौके पर भेजा गया। कई स्थानों पर आग पर काबू पा लिया गया, लेकिन कुछ क्षेत्रों में आग ने तेजी से फैलकर वन संपदा को नुकसान पहुंचाया।
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, इस बार शीतकाल में वर्षा सामान्य से कम रही। पहाड़ी इलाकों में भी अपेक्षित बर्फबारी नहीं हुई। नमी की कमी के चलते जंगल अत्यधिक संवेदनशील हो गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आगामी दिनों में तापमान बढ़ता है और तेज हवाएं चलती हैं, तो आग की घटनाओं में और इजाफा हो सकता है।
वन विभाग का दावा है कि इस बार फायर सीजन को लेकर पहले से व्यापक तैयारियां की गई हैं। फायर वॉचर्स की तैनाती, कंट्रोल रूम की 24 घंटे निगरानी, फायर लाइन की सफाई और संवेदनशील क्षेत्रों की विशेष मॉनिटरिंग की जा रही है। ड्रोन और सैटेलाइट अलर्ट सिस्टम के जरिए आग की घटनाओं पर नजर रखी जा रही है।इसके अलावा ग्रामीणों और स्थानीय वन पंचायतों को भी जागरूक किया जा रहा है कि वे जंगलों में आग न लगाएं और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना दें।
वन अधिकारियों का कहना है कि असली परीक्षा अब शुरू हुई है। मानसून आने तक जंगलों को आग से सुरक्षित रखना बड़ी चुनौती होगी। हर साल मार्च से जून के बीच आग की घटनाएं चरम पर होती हैं। ऐसे में विभाग को मानव संसाधन, उपकरण और त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत बनाए रखना होगा।
पर्यावरणविदों का मानना है कि जंगलों में बार-बार लगने वाली आग से जैव विविधता, वन्यजीव और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र पर गंभीर असर पड़ता है। साथ ही, इससे कार्बन उत्सर्जन बढ़ता है और जल स्रोत भी प्रभावित होते हैं। फिलहाल, राज्य में फायर सीजन की शुरुआत ने ही हालात की गंभीरता को उजागर कर दिया है। आने वाले महीनों में प्रशासन, वन विभाग और आम नागरिकों की सतर्कता ही जंगलों को सुरक्षित रखने में अहम भूमिका निभाएगी।
