उत्तराखंड में गुलदार का आतंक: आंगन में खेल रही पांच साल की बच्ची को बनाया निवाला

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पौड़ी। उत्तराखंड में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। हाथी और भालू के हमलों में दो दिनों के भीतर दो लोगों की जान जाने के बाद अब गुलदार ने एक और मासूम की जिंदगी छीन ली। पौड़ी के समीप वजली गांव में घर के आंगन में खेल रही पांच वर्षीय बच्ची पर गुलदार ने हमला कर दिया। हमले में बच्ची की मौत हो गई। वहीं, आठ साल की एक अन्य बच्ची को भी गुलदार ने हमला कर घायल कर दिया।

जानकारी के अनुसार, पौड़ी के मल्ली गांव निवासी कृष्ण कुमार की पांच वर्षीय बेटी आरुषि कुछ महीने पहले अपनी मां बबीता देवी के साथ ननिहाल वजली गांव आई थी। मंगलवार शाम करीब सवा छह बजे आरुषि घर के आंगन में खेल रही थी। इसी दौरान घात लगाए बैठे गुलदार ने अचानक उस पर हमला कर दिया और उसे उठाकर ले गया। घटना के समय परिवार के सदस्य भी घर पर मौजूद थे। बच्ची की चीख-पुकार सुनकर ग्रामीण मौके पर पहुंचे और शोर मचाना शुरू किया। लोगों को अपनी ओर आता देख गुलदार बच्ची को झाड़ियों में छोड़कर जंगल की ओर भाग गया। हालांकि, तब तक बच्ची की जान जा चुकी थी।

घटना के बाद ग्रामीणों में आक्रोश, वन विभाग के खिलाफ प्रदर्शन

मासूम की मौत के बाद पूरे क्षेत्र में मातम पसरा हुआ है। वहीं, लगातार हो रहे वन्यजीवों के हमलों से ग्रामीणों में भारी आक्रोश है। घटना से गुस्साए लोगों ने वन मंत्री सुबोध उनियाल और स्थानीय विधायक राजकुमार पोरी के खिलाफ प्रदर्शन कर नारेबाजी की। इस दौरान विधायक का घेराव भी किया गया। ग्रामीणों ने क्षेत्र में गुलदार के आतंक से निजात दिलाने और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग उठाई।

गुलदार को आदमखोर घोषित करने की प्रक्रिया शुरू

घटना की सूचना मिलते ही वन विभाग की टीम मौके पर पहुंच गई। डीएफओ गढ़वाल महातिम यादव ने बताया कि विभागीय टीम क्षेत्र में निगरानी कर रही है। गुलदार को आदमखोर घोषित करने के लिए मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक को पत्र भेज दिया गया है। आगे की कार्रवाई उच्च स्तर से मिलने वाले निर्देशों के आधार पर की जाएगी।

वन्यजीव हमलों में इस साल 57 लोगों की मौत

प्रदेश में मानव और वन्यजीवों के बीच बढ़ता संघर्ष अब गंभीर चिंता का विषय बन गया है। हाथी, भालू और गुलदार के हमलों में लगातार लोगों की जान जा रही है। आंकड़ों के अनुसार, इस साल वन्यजीवों के हमलों में अब तक 57 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि पिछले साल यह संख्या 62 रही थी। लगातार सामने आ रही घटनाएं पहाड़ी क्षेत्रों में ग्रामीणों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं।

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