ऋषिकेश की तपोभूमि में पुनः जागृत हुई तपस्या की ज्योति, स्वामी समर्पणानन्द महाराज ने आरंभ की पंचाग्नि साधना

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ऋषिकेश/तपोवन: देवभूमि उत्तराखंड सर्दियों से तप, त्याग और साधना की भूमि रही है। इस पावन धरती पर एक से बढ़कर एक तपस्वी हुए हैं और आज भी अनेक संत-साधक कठिन से कठिन परिस्थितियों में साधना में लीन हैं। कोई हिमालय की ऊँचाइयों पर माइनस डिग्री तापमान में तप कर रहा है, तो कोई हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच साधना में मग्न है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए विश्व विख्यात तपस्वी स्वामी समर्पणानन्द महाराज ने एक बार फिर कठोर पंचाग्नि साधना का शुभारंभ कर दिया है।

गंगा तट के समीप तीर्थनगरी ऋषिकेश के तपोवन क्षेत्र में स्थित आश्रम में स्वामी समर्पणानन्द महाराज की यह अत्यंत कठिन और दुर्लभ साधना 15 जनवरी 2026 से 25 मई 2026 तक चलेगी। इस साधना का उनके भक्तों और साधकों को लंबे समय से इंतजार रहता है। देश-विदेश से श्रद्धालु इस अवधि में आश्रम पहुँचकर स्वामी जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। पंचाग्नि साधना के दौरान स्वामी समर्पणानन्द महाराज पूर्ण मौन व्रत का पालन करते हैं। वे किसी से मौखिक संवाद नहीं करते, केवल संकेतों के माध्यम से ही संप्रेषण करते हैं। साधना की कठोरता और नियमों के कारण आश्रम में विशेष अनुशासन का पालन कराया जाता है।

स्वामी के अनुसार, पंचाग्नि साधना भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा में निहित एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली वैदिक आध्यात्मिक अनुष्ठान है। यह चांदोग्य उपनिषद और बृहदारण्यक उपनिषद में वर्णित पंचाग्नि विद्या पर आधारित है। यह विद्या ब्रह्मांडीय प्रक्रियाओं को मानव के आंतरिक रूपांतरण से जोड़ती है और जीवन तथा चेतना को संचालित करने वाली सूक्ष्म शक्तियों के प्रति अनुशासन, संयम और जागरूकता का संदेश देती है।

पंचाग्नि साधना को प्राचीन योगिक परंपरा में सबसे तीव्र और कठोर योगिक अभ्यासों में गिना जाता है। “पंचाग्नि” शब्द गहन तपस्या, आंतरिक शुद्धि और निरंतर आध्यात्मिक अनुशासन के माध्यम से पूर्ण समर्पण का प्रतीक है। इसे गुप्त तांत्रिक विद्याओं में से एक माना जाता है, जो पारंपरिक रूप से माँ भैरवी से जुड़ी हुई है।

मान्यता है कि इस पवित्र साधना के माध्यम से साधक को भैरव बाबा और माँ भैरवी की कृपा प्राप्त होती है, जिससे वह स्वाभाविक रूप से शिवत्व में विलीन होने की ओर अग्रसर होता है। पारंपरिक समझ के अनुसार, यह साधना शक्ति के शिव में अंतिम मिलन का प्रतीक है, जहाँ माँ भैरवी स्वयं शिवत्व में विलीन होकर दुख और बंधन के संसार में पुनः लौटती नहीं हैं। यह भय, सीमाओं और कर्मबंधन से परे मोक्ष का मार्ग दर्शाती है। अत्यधिक शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक मांगों के कारण यह साधना केवल अत्यंत अनुभवी और सिद्ध योगियों द्वारा ही की जाती है। इसका उद्देश्य न केवल व्यक्तिगत आत्मिक उन्नति है, बल्कि कर्मिक अशुद्धियों का दहन, उच्च चेतना की अवस्थाओं को स्थिर करना और सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रसार भी है।

स्वामी समर्पणानन्द महाराज यह पवित्र पंचाग्नि साधना समस्त विश्व के कल्याण और वैश्विक शांति के लिए कर रहे हैं। उनका मानना है कि जब साधना का उद्देश्य सार्वभौमिक कल्याण हो, तभी उसकी वास्तविक शक्ति प्रकट होती है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि इस साधना की पवित्रता और प्रभाव तभी सुरक्षित रह सकते हैं, जब इसके सभी नियमों और अनुशासनों का कठोरता से पालन किया जाए।देवभूमि की इस तपोस्थली में एक बार फिर तपस्या की अग्नि प्रज्वलित हो चुकी है, जो आने वाले महीनों तक आध्यात्मिक ऊर्जा से पूरे वातावरण को आलोकित करती है।

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