सदियों की आस्था को फिर जगाने की कोशिश, धराली में मलबे के नीचे दबे कल्पकेदार मंदिर की तलाश तेज

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उत्तरकाशी: धराली में आई विनाशकारी बाढ़ के मलबे में दबे प्राचीन कल्पकेदार मंदिर को फिर से खोजने की उम्मीदें अब जोर पकड़ने लगी हैं। मंदिर को मलबे से बाहर निकालने के लिए खोदाई का कार्य लगातार जारी है। दो दिनों में करीब 10 से 11 फीट तक खोदाई की जा चुकी है। सदियों पुरानी आस्था से जुड़े इस मंदिर की तलाश पर स्थानीय ग्रामीणों के साथ ही देश-प्रदेश के लोगों की निगाहें टिकी हुई हैं।

खीरगंगा नदी में आई बाढ़ ने धराली में भारी तबाही मचाई थी। इस दौरान प्राचीन कल्पकेदार मंदिर का ऊपरी ढांचा क्षतिग्रस्त हो गया और पूरा मंदिर मलबे में दब गया। अब ग्रामीणों ने एक बार फिर मंदिर को उसके मूल स्वरूप में खोजने की पहल की है। उन्हें विश्वास है कि पहले की तरह इस बार भी मंदिर को मलबे से बाहर निकाला जा सकेगा।

सदियों पुराना है मंदिर का इतिहास

श्री कल्पकेदार मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेश पंवार के अनुसार, कल्पकेदार मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। यह कभी 240 मंदिरों के समूह का हिस्सा रहा था। क्षेत्र में 18वीं और 19वीं शताब्दी के दौरान भी विनाशकारी बाढ़ की घटनाएं हुईं, जिनमें मंदिर मलबे में दबे। हालांकि, बाद में खोदाई कर इन्हें दोबारा बाहर निकाला गया।

मंदिर से जुड़ी ऐतिहासिक घटनाएं और स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था ही इस अभियान का सबसे बड़ा आधार हैं। ग्रामीणों को उम्मीद है कि इस बार भी खोदाई सफल होगी और क्षेत्र की प्राचीन धार्मिक विरासत को फिर से सामने लाया जा सकेगा।

सोमेश्वर देवता की अनुमति के बाद शुरू हुआ अभियान

धराली आपदा की पहली बरसी पर पांच अगस्त को ग्रामीणों ने मंदिर को मलबे से बाहर निकालने की पहल की थी। गांव के आराध्य सोमेश्वर देवता की अनुमति के बाद नवरात्र के पहले दिन खोदाई शुरू करने का निर्णय लिया गया। इसके बाद रविवार को विधिवत पूजा-अर्चना और भूमि पूजन के साथ अभियान का शुभारंभ किया गया।

ग्रामीण एक्सकेवेटर मशीन की मदद से खोदाई करा रहे हैं। इस कार्य में होने वाले खर्च के लिए स्थानीय स्तर पर चंदा एकत्र किया जा रहा है। अभियान का उद्देश्य मंदिर को सुरक्षित तरीके से खोजकर बाहर निकालना है, ताकि धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व की इस धरोहर को संरक्षित किया जा सके।

जीपीएस से चिह्नित किया गया था मंदिर का स्थान

आपदा के बाद मंदिर की तलाश के लिए समिति के पदाधिकारियों ने जीपीएस ट्रैकिंग की मदद ली थी। 21 अगस्त को समिति अध्यक्ष राजेश पंवार, सचिव संजय पंवार, संयोजक दुर्गेश पंवार, सहसचिव संतोष पंवार और सदस्य सचेंद्र पंवार सहित अन्य लोगों ने मलबे के बीच मंदिर के संभावित मूल स्थान को चिह्नित किया था।

बाढ़ के बाद क्षेत्र में दूर-दूर तक मलबा फैल गया था, जिससे मंदिर की सही स्थिति का पता लगाना चुनौतीपूर्ण हो गया था। जीपीएस की सहायता से स्थान चिह्नित होने के बाद अब उसी क्षेत्र में सावधानीपूर्वक खोदाई की जा रही है।

1926 की बाढ़ के बाद भी निकाला गया था मंदिर

उपलब्ध ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, कल्पकेदार मंदिर परिसर में कभी बड़ी संख्या में मंदिर थे। वर्ष 1803 की विनाशकारी बाढ़ में इस समूह के अधिकांश मंदिर बह गए या मलबे में दब गए थे। वर्ष 1887 में यहां तीन मंदिर दिखाई देने का उल्लेख मिलता है। इसके बाद 1926 में आई बाढ़ से मंदिर का आधा हिस्सा फिर मलबे में दब गया था, जिसे खोदाई के माध्यम से बाहर निकाला गया।

पांच अगस्त 2025 को आई आपदा के बाद मंदिर एक बार फिर मलबे में दब गया। करीब एक सदी बाद दोबारा शुरू हुआ यह अभियान अब मंदिर के संभावित मूल स्थान से लगभग 50 से 60 मीटर पीछे की ओर चलाया जा रहा है। ऐसा मंदिर के अवशेषों को किसी तरह का नुकसान पहुंचने से बचाने के उद्देश्य से किया जा रहा है।

फिलहाल खोदाई का कार्य जारी है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि मलबे की परतों के नीचे प्राचीन कल्पकेदार मंदिर के अवशेष कब सामने आते हैं। ग्रामीणों के लिए यह केवल एक मंदिर की खोज नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक विरासत, परंपरा और आस्था को फिर से जीवंत करने की कोशिश भी है।

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