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देहरादून / उत्तराखंड : उत्तराखंड में जंगलों की आग की समस्या से निपटने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में एक नई पहल सामने आई है। अब तक जंगलों के लिए खतरा मानी जाने वाली चीड़ की सूखी पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में “पिरुल” कहा जाता है, अब हरित अर्थव्यवस्था का मजबूत आधार बनती जा रही हैं।

राज्य सरकार पिरुल के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए ब्रिकेट्स और पैलेट्स निर्माण इकाइयों की स्थापना पर जोर दे रही है। इन इकाइयों में पिरुल को प्रोसेस कर ईंधन के रूप में इस्तेमाल योग्य ब्रिकेट्स और पैलेट्स तैयार किए जाते हैं, जो कोयले और लकड़ी का पर्यावरण अनुकूल विकल्प साबित हो रहे हैं। इससे न केवल कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी, बल्कि ऊर्जा के क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलेगा। हर साल गर्मियों में चीड़ के जंगलों में गिरने वाली सूखी पत्तियां तेजी से आग पकड़ लेती हैं, जिससे बड़े पैमाने पर वन संपदा को नुकसान होता है। अब इन पत्तियों को इकट्ठा कर उपयोग में लाने से जंगलों में आग लगने की घटनाओं में कमी आने की उम्मीद है। इसके साथ ही यह पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

इस योजना के तहत स्थानीय ग्रामीणों, स्वयं सहायता समूहों और वन पंचायतों को पिरुल संग्रहण और प्रोसेसिंग से जोड़ा जा रहा है। इससे उन्हें अतिरिक्त आय का स्रोत मिलेगा और स्वरोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह पहल आर्थिक रूप से सशक्तिकरण का माध्यम बन सकती है।

सरकार का मानना है कि पिरुल आधारित उद्योगों को बढ़ावा देकर राज्य में हरित ऊर्जा के क्षेत्र को मजबूती मिलेगी और साथ ही पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिलेगी। आने वाले समय में यह पहल उत्तराखंड को एक सशक्त हरित अर्थव्यवस्था की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभा सकती है।

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