13 जनवरी को लोहड़ी का जश्न: ढोल-नगाड़ों, लोकगीतों और परिक्रमा का उल्लास
बाहर कड़ाके की ठंड है और रजाई से निकलने का बिल्कुल मन नहीं करता, लेकिन 13 जनवरी आते-आते माहौल अपने आप बदल जाता है। उत्तर भारत में खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोहड़ी पर्व का उत्साह हर चेहरे पर दिखाई देने लगता है। ठंडी हवाओं के बीच जब शाम ढलती है, तो आंगनों और चौपालों में जलती लोहड़ी की अग्नि न केवल शरीर को गर्माहट देती है, बल्कि दिलों को भी आपस में जोड़ देती है।
लोहड़ी के दिन वातावरण पूरी तरह से लोकसंस्कृति के रंग में रंग जाता है। कानों में पारंपरिक लोकगीत गूंजते हैं, ढोल की थाप पर युवा, बुजुर्ग और बच्चे सभी थिरकने लगते हैं। लोग पारंपरिक परिधान पहनकर अग्नि के चारों ओर परिक्रमा करते हैं और उसमें फुल्ले, मूंगफली, तिल और गुड़ अर्पित करते हैं। यह अग्नि नई फसल, समृद्धि और खुशहाली की प्रतीक मानी जाती है। मान्यता है कि लोहड़ी की आग में अर्पण करने से घर में सुख-शांति और बरकत बनी रहती है।
लोहड़ी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि आपसी भाईचारे और सामूहिक खुशी का उत्सव है। इस दिन लोग पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को मिठाइयाँ बांटते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। खासकर नवविवाहितों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए लोहड़ी का विशेष महत्व होता है, जहां पहली लोहड़ी को बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है।

कड़कड़ाती ठंड के बीच जलती लोहड़ी की अग्नि हमें यह एहसास कराती है कि त्योहार सिर्फ मौसम नहीं बदलते, बल्कि मन को भी नई ऊर्जा से भर देते हैं। यही वजह है कि चाहे कितनी भी ठंड क्यों न हो, लोहड़ी की शाम आते ही रजाई से बाहर निकलकर लोग इस पर्व का आनंद लेने से खुद को रोक नहीं पाते।
