मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने की जताई आशंका
ऋषिकेश : ऋषिकेश में एक ओर केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे योजना के तहत गंगा की स्वच्छता और अविरलता बनाए रखने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर वीरभद्र बैराज जलाशय में सी-प्लेन संचालन की तैयारियों ने पर्यावरणीय बहस को जन्म दे दिया है। गंगा में गिरने वाले दूषित नालों की टैपिंग, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण और जनजागरूकता अभियानों के जरिए सरकार लगातार नदी संरक्षण के प्रयास कर रही है।
इसी बीच ऋषिकेश में साहसिक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से वीरभद्र बैराज में सी-प्लेन उतारने का परीक्षण किया जा रहा है, जिसे लेकर पर्यावरणविदों ने गंभीर आपत्ति जताई है।अंतर्राष्ट्रीय क्लाइमेट एक्शन लीडरशिप अवार्ड 2025 से सम्मानित पर्यावरणविद डॉ. विनोद प्रसाद जुगलान का कहना है कि यह पहल पर्यावरण संरक्षण के मूल सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने बताया कि गंगा को हमारे वेद-पुराणों में “मकर वाहिनी” कहा गया है, जहां मगरमच्छ सहित कई जलीय जीव बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। ऐसे में सी-प्लेन की लैंडिंग और टेकऑफ के दौरान उत्पन्न होने वाली तेज हलचल और ध्वनि प्रदूषण जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।
डॉ. जुगलान के अनुसार, इससे खासकर मगरमच्छ, कछुए और अन्य जलीय जीवों के जीवन चक्र पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। इसके साथ ही राजाजी नेशनल पार्क के वन्यजीवों की दिनचर्या भी प्रभावित हो सकती है, जो प्रतिदिन इस क्षेत्र में पानी पीने आते हैं। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जंगली हाथियों को जल स्रोतों तक पहुंचने में बाधा उत्पन्न होती है, तो वे आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर सकते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में वृद्धि हो सकती है और नीलकंठ महादेव मार्ग पर आवागमन भी प्रभावित हो सकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि सी-प्लेन के इंजन से उत्पन्न अत्यधिक शोर न केवल जलीय जीवों बल्कि तटवर्ती पक्षियों और पशुओं के लिए भी हानिकारक साबित होगा। गंगा को केवल एक नदी नहीं बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर बताते हुए उन्होंने कहा कि यह करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है और ऋषिकेश की पहचान भी इससे जुड़ी है।
डॉ. जुगलान ने पर्यटन के बजाय तीर्थाटन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि साहसिक पर्यटन के नाम पर धार्मिक स्थलों की मूल भावना से छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने स्कंद पुराण के केदार खंड का उल्लेख करते हुए कहा कि ऋषिकेश की कई प्राचीन नदियां जैसे रम्भा, चंद्रभागा और सरस्वती पहले ही उपेक्षा के कारण अपना अस्तित्व खो चुकी हैं।
पर्यावरणविदों ने सरकार से इस परियोजना पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए कहा है कि जंगलों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप का परिणाम ही है कि वन्यजीव अपने प्राकृतिक आवास छोड़कर आबादी की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे में बिना व्यापक अध्ययन और पर्यावरणीय आकलन के इस प्रकार की परियोजनाओं को जल्दबाजी में लागू करना उचित नहीं होगा।
