मकर संक्रांति पर परमार्थ निकेतन गंगा तट पर श्रद्धा का महाकुंभ, वैदिक मंत्रोच्चार संग श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी

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ऋषिकेश : मकर संक्रांति के पावन अवसर पर परमार्थ निकेतन, ऋषिकेश के दिव्य गंगा तट पर आस्था, आध्यात्म और वैश्विक एकता का अद्भुत संगम देखने को मिला। इस शुभ अवसर पर परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती के सान्निध्य में ऋषि कुमारों, साधु-संतों तथा विश्व के अनेक देशों से आए श्रद्धालुओं ने वैदिक मंत्रोच्चार और शंखध्वनि के बीच पवित्र गंगा में आस्था की डुबकी लगाई। प्रातःकाल से ही गंगा तट पर भक्तों का तांता लगा रहा। मंत्रोच्चार, ध्यान और योग के वातावरण ने पूरे क्षेत्र को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। गंगा स्नान के उपरांत श्रद्धालुओं ने सूर्य देव को अर्घ्य अर्पित कर सुख-समृद्धि और विश्व कल्याण की कामना की।

इस अवसर पर स्वामी चिदानंद सरस्वती ने मकर संक्रांति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और सामाजिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “मकर संक्रांति का पावन स्नान जीवन में नए संकल्प, नई दिशा और नई ऊर्जा का आह्वान करता है। यह पर्व केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मकता के साथ आगे बढ़ाने की प्रेरणा है।”स्वामी ने कहा कि मकर संक्रांति के समय सूर्य की स्थिति में परिवर्तन और पृथ्वी के झुकाव में बदलाव से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। ठंडे जल में स्नान करने से रक्त संचार बेहतर होता है, प्रतिरक्षा प्रणाली सुदृढ़ होती है और शरीर में नवस्फूर्ति का संचार होता है। यही कारण है कि प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इस दिन के स्नान को स्वास्थ्य, संतुलन और दीर्घायु से जोड़ा है।

उन्होंने कहा कि “यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में आने वाले परिवर्तनों को पवित्रता, साहस और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ स्वीकार करना चाहिए। जब सूर्य अपनी दिशा बदलता है, तब हमें भी अपने जीवन की दिशा को अंधकार से प्रकाश, स्वार्थ से सेवा और विभाजन से सद्भाव की ओर मोड़ने का संकल्प लेना चाहिए।

स्वामी चिदानंद सरस्वती ने मकर संक्रांति पर पतंग उड़ाने की परंपरा का भी गूढ़ अर्थ समझाते हुए कहा कि पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं है, बल्कि यह जीवन का सुंदर प्रतीक है। उन्होंने कहा, पतंग तभी ऊँचाई पर उड़ती है जब उसमें संतुलन, धैर्य और सही दिशा होती है। यदि डोर ढीली हो जाए तो पतंग गिर जाती है और यदि अत्यधिक खिंचाव हो तो टूट जाती है। ठीक इसी प्रकार जीवन भी संतुलन का नाम है।

उन्होंने आगे कहा कि जीवन रुकने या थकने का नहीं, बल्कि सूर्य की तरह निरंतर आगे बढ़ते रहने और दूसरों को प्रकाश देने का संदेश देता है। मकर संक्रांति हमें यही प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन को ऊर्जावान, उद्देश्यपूर्ण और समाज के लिए उपयोगी बनाएं। कार्यक्रम के अंत में विश्व शांति, पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण के लिए विशेष प्रार्थना की गई। परमार्थ निकेतन गंगा तट पर मकर संक्रांति का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक बना, बल्कि यह संदेश भी देता है कि भारतीय संस्कृति आज भी पूरी दुनिया को संतुलन, सकारात्मकता और सेवा का मार्ग दिखा रही है।

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