ऋषिकेश के त्रिवेणी घाट पर विशेष सफाई कार्यक्रम

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ऋषिकेश: जल प्रकृति का अमूल्य उपहार है, जो जीवन की आधारशिला और मानव सभ्यता की जीवनरेखा के रूप में सदैव महत्वपूर्ण रहा है। जब जल स्वच्छ और संरक्षित रहता है, तब केवल पर्यावरण ही नहीं, बल्कि समाज का सामूहिक स्वास्थ्य और संतुलन भी सुदृढ़ होता है। इसी सोच को साकार रूप देते हुए प्राकृतिक जल स्रोतों नदियों, तालाबों, झीलों और समुद्री तटों—की निस्वार्थ भाव से स्वच्छता एवं संरक्षण का व्यापक अभियान देशभर में प्रेरणा का स्रोत बनता जा रहा है।

स्वच्छ जल, स्वच्छ मन’ अभियान के चौथे चरण का भव्य एवं प्रेरणास्पद आयोजन सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज एवं निरंकारी राजपिता रमित जी के मार्गदर्शन में भारतवर्ष के 25 राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों के 930 शहरों के 1600 से अधिक स्थानों पर सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। इस अभियान में लगभग 12 लाख स्वयंसेवकों ने भाग लेकर सेवा, अध्यात्म और सामाजिक उत्तरदायित्व का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। यह पहल केवल पर्यावरणीय स्वच्छता तक सीमित नहीं रही, बल्कि जागरूकता, जिम्मेदारी और सामूहिक सहभागिता का सशक्त संदेश भी देती रही।संत निरंकारी मिशन की सामाजिक शाखा संत निरंकारी चैरिटेबल फाउंडेशन के तत्वावधान में, बाबा हरदेव सिंह जी की शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हुए ‘प्रोजेक्ट अमृत’ के अंतर्गत इस अभियान का आयोजन किया गया। इसका उद्देश्य मानवता को प्रकृति के प्रति संवेदनशील बनाना तथा जल संरक्षण, स्वच्छता और पर्यावरण संतुलन के प्रति सामूहिक संकल्प को मजबूत करना है।

इसी क्रम में ऋषिकेश ब्रांच द्वारा गंगा नदी के पावन तट त्रिवेणी घाट पर विशेष स्वच्छता अभियान चलाया गया। प्रातः 7:30 बजे साध संगत, सेवादल एवं चैरिटेबल फाउंडेशन के लगभग 150 स्वयंसेवक त्रिवेणी घाट पर एकत्रित हुए। कार्यक्रम की शुरुआत सामूहिक प्रार्थना से हुई, जिसके पश्चात गंगा तट पर सघन सफाई अभियान प्रारंभ किया गया। स्वयंसेवकों ने घाटों पर झाड़ू लगाकर, नदी किनारों से कूड़ा एकत्रित कर तथा आसपास के क्षेत्रों की सफाई कर स्वच्छता का संदेश दिया। एकत्रित कचरे को नगर निगम के सहयोग से उचित स्थान पर पहुंचाया गया।

सफाई अभियान के उपरांत त्रिवेणी घाट पर सत्संग का आयोजन किया गया, जिसमें ब्रांच इंचार्ज महादेव प्रसाद कुड़ियाल ने सतगुरु का पावन संदेश संगत के समक्ष प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति केवल उपासना तक सीमित नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने में भी निहित है।यह परियोजना न केवल गंगा तट की स्वच्छता का प्रतीक बनी, बल्कि मानवता को यह संदेश भी देती है कि यदि सामूहिक संकल्प और सेवा भाव के साथ प्रयास किए जाएं, तो पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय परिवर्तन संभव है। ‘स्वच्छ जल, स्वच्छ मन’ अभियान ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि अध्यात्म और सेवा का समन्वय समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की सशक्त शक्ति रखता है।

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