परमार्थ निकेतन में 78वें सेना दिवस व मकर संक्रांति पर वैदिक अनुष्ठान, शिवाभिषेक और विश्व शांति प्रार्थना

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ऋषिकेश : परमार्थ निकेतन में 78वें सेना दिवस और मकर संक्रांति के पावन अवसर पर आध्यात्मिक ऊर्जा, राष्ट्रभक्ति और विश्व कल्याण की भावना से ओतप्रोत भव्य आयोजन किया गया। गंगा तट पर वैदिक मंत्रोच्चार, विशेष पूजा-अर्चना, शिवाभिषेक और विश्व शांति प्रार्थना के माध्यम से देश की सुरक्षा, समृद्धि और मानवता के कल्याण की कामना की गई।

इस अवसर पर परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज, परमार्थ गुरुकुल के ऋषिकुमार, विद्वान पुरोहित तथा देश-विदेश से आए श्रद्धालु बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। सभी ने एक स्वर में भारत माता की सुख-समृद्धि, सीमाओं की सुरक्षा, वीर सैनिकों के शौर्य और विश्व शांति के लिए विशेष प्रार्थनाएं अर्पित कीं। गंगा तट पर वैदिक ऋचाओं और मंत्रों की दिव्य ध्वनि के बीच भगवान शिव का रुद्राभिषेक किया गया। मंत्रोच्चार के साथ हुए इस शिवाभिषेक को राष्ट्र की मजबूती, आपदाओं से रक्षा और वैश्विक शांति से जोड़ते हुए श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण आस्था के साथ सहभागिता की।

स्वामी चिदानंद सरस्वती महाराज ने अपने संबोधन में भारतीय सेना के अद्वितीय योगदान को नमन करते हुए कहा कि “भारतीय सेना केवल हमारी सीमाओं की रक्षा नहीं करती, बल्कि वह भारत की आत्मा, अस्मिता और स्वाभिमान की प्रहरी है। हमारे वीर सैनिक वेतन के लिए नहीं, वतन के लिए जीते हैं। उनका जीवन त्याग, तपस्या और राष्ट्रभक्ति की जीवंत मिसाल है।”उन्होंने कहा कि जब हम शांति से अपने घरों में सोते हैं, तब हमारे सैनिक बर्फीली चोटियों, रेगिस्तानों और सीमाओं पर जागकर देश की सुरक्षा में तैनात रहते हैं।

मकर संक्रांति के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए स्वामी जी ने कहा कि यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने का प्रतीक है, जो जीवन में अंधकार से प्रकाश की ओर, नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर और आत्मकेंद्रित जीवन से राष्ट्र एवं समाज के प्रति समर्पित जीवन की ओर अग्रसर होने का संदेश देता है।उन्होंने कहा कि मकर संक्रांति हमें अपने भीतर की सीमाओं को तोड़कर सेवा, करुणा और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।

कार्यक्रम के दौरान विश्व शांति प्रार्थना में सभी धर्मों, संस्कृतियों और देशों के कल्याण की कामना की गई। श्रद्धालुओं ने हाथों में दीप प्रज्ज्वलित कर गंगा मां से प्रार्थना की कि संपूर्ण विश्व में शांति, सद्भाव और मानवता का प्रकाश फैले।

यह आयोजन आध्यात्मिकता और राष्ट्रभक्ति के अद्भुत संगम का साक्षी बना, जहां सनातन संस्कृति, भारतीय सेना के सम्मान और वैश्विक कल्याण का संदेश एक साथ प्रवाहित हुआ। परमार्थ निकेतन का यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक रहा, बल्कि देशप्रेम और विश्व बंधुत्व की भावना को भी सुदृढ़ करता नजर आया।

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