घीत्यार: उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पहाड़ी परंपराओं से जुड़ा अनोखा पर्व
उत्तराखंड की संस्कृति अपनी लोकपरंपराओं, रीति-रिवाजों और प्रकृति से जुड़े त्योहारों के लिए देशभर में अलग पहचान रखती है। इन्हीं पारंपरिक लोकपर्वों में से एक है घीत्यार, जिसे उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में विशेष उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। यह पर्व पहाड़ की पारंपरिक जीवनशैली, खान-पान, परिवार और लोकविश्वासों की खूबसूरत झलक प्रस्तुत करता है।
घीत्यार (घी संक्रांति) हर साल भाद्रपद संक्रांति के दिन मनाया जाता है। यह आमतौर पर अगस्त महीने में पड़ता है। इस बार यह त्यौहार में घीत्यार/घी संक्रांति 17 अगस्त 2026, सोमवार को है।
इसे खास तौर पर उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में पारंपरिक रूप से मनाया जाता है। इस दिन घी का सेवन करने और घी से बने पारंपरिक पकवान खाने की परंपरा है।
🪔 क्यों मनाया जाता है घीत्यार?
घीत्यार का संबंध मुख्य रूप से घी खाने की परंपरा से माना जाता है। लोकमान्यता है कि इस दिन घी का सेवन करना शुभ और स्वास्थ्यवर्धक होता है। पहाड़ के पारंपरिक जीवन में घी को केवल भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि ऊर्जा और पोषण का महत्वपूर्ण स्रोत माना जाता रहा है।
पुराने समय में पहाड़ों में खेती और पशुपालन ग्रामीण जीवन का आधार थे। घरों में गाय-भैंस का दूध और उससे तैयार होने वाला घी रोजमर्रा के खान-पान का महत्वपूर्ण हिस्सा था। ऐसे में घीत्यार जैसे पर्व इन पारंपरिक खाद्य पदार्थों को लोकजीवन और उत्सव से जोड़ते थे।
घी से बनते हैं पारंपरिक पकवान
घीत्यार के अवसर पर घरों में घी से जुड़े पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं। पहाड़ी परिवारों में स्थानीय अनाज और आटे से बनने वाले व्यंजनों में घी का विशेष इस्तेमाल किया जाता है।

कई घरों में रोट, पूरी, हलवा और अन्य पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं और परिवार के लोग साथ बैठकर भोजन करते हैं। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इस पर्व को मनाने की परंपराओं और पकवानों में अंतर भी देखने को मिलता है।
पहाड़ की कृषि संस्कृति से जुड़ा पर्व
उत्तराखंड के अधिकांश लोकपर्व सीधे तौर पर प्रकृति और कृषि चक्र से जुड़े रहे हैं। घीत्यार भी इसी पारंपरिक लोकजीवन का हिस्सा माना जाता है।पहाड़ में त्योहार केवल धार्मिक आयोजन नहीं रहे, बल्कि इनके माध्यम से कृषि, पशुपालन, मौसम, भोजन और सामाजिक जीवन आपस में जुड़े रहे हैं। यही वजह है कि उत्तराखंड के लोकपर्व आज भी यहां की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
परिवार को जोड़ने वाला त्योहार
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में त्योहार परिवार को एक साथ बैठने और अपनी जड़ों से जुड़ने का अवसर देते हैं। घीत्यार भी इसी भावना को मजबूत करता है।बुजुर्ग नई पीढ़ी को पर्व से जुड़ी परंपराएं बताते हैं। घर की महिलाएं पारंपरिक पकवान तैयार करती हैं और परिवार के लोग मिलकर त्योहार का आनंद लेते हैं। इस तरह एक छोटा-सा लोकपर्व पीढ़ियों के बीच संस्कृति और परंपराओं के हस्तांतरण का माध्यम बन जाता है।
बदलते समय में भी कायम है परंपरा
आधुनिकता और बदलती जीवनशैली के बावजूद उत्तराखंड में कई पारंपरिक त्योहार आज भी मनाए जाते हैं। हालांकि शहरों में इनके स्वरूप में बदलाव आया है, लेकिन गांवों में इनसे जुड़ी कई पुरानी परंपराएं अब भी देखने को मिलती हैं।
घीत्यार हमें यह याद दिलाता है कि पहाड़ की संस्कृति केवल बड़े और प्रसिद्ध त्योहारों तक सीमित नहीं है। यहां के छोटे-छोटे लोकपर्व भी लोगों की सामूहिक स्मृतियों, खान-पान और सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
नई पीढ़ी तक पहुंचे लोकपर्वों की विरासत
आज आवश्यकता इस बात की है कि उत्तराखंड की ऐसी लोकपरंपराओं को केवल त्योहार मनाने तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इनके पीछे छिपे सांस्कृतिक महत्व को भी नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए।घीत्यार जैसे पर्व हमें हमारी जड़ों, पहाड़ी खान-पान, पारिवारिक परंपराओं और लोकसंस्कृति से जोड़ते हैं। यही छोटी-छोटी परंपराएं मिलकर उत्तराखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बनाती हैं।
घीत्यार इसलिए खास है क्योंकि इसमें उत्सव के साथ पहाड़ का स्वाद, परिवार का अपनापन और अपनी मिट्टी से जुड़े रहने की भावना भी शामिल है।
