आपकी कुंठाएं आपके दुख का कारण क्यों हैं? जानिए मन और शरीर पर असर

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आपकी कुंठाएं आपके दुख का कारण हैं हमारे जीवन में दुख हमेशा बाहर की परिस्थितियों से नहीं आता। कई बार हमारे भीतर जमा हुई कुंठाएं, अपेक्षाएं, गुस्सा, तुलना और पुराने अनुभव ही हमारे दुख का सबसे बड़ा कारण बन जाते हैं।

कुंठा तब पैदा होती है जब जीवन हमारी इच्छा के अनुसार नहीं चलता। हम किसी से सम्मान चाहते हैं, लेकिन सम्मान नहीं मिलता। हम प्यार चाहते हैं, लेकिन सामने वाला हमारी भावनाओं को नहीं समझता। हम मेहनत करते हैं, लेकिन सफलता किसी और को मिलती दिखाई देती है। हम किसी रिश्ते को बचाना चाहते हैं, लेकिन दूसरा व्यक्ति उसे महत्व नहीं देता।

ऐसी परिस्थितियों में मन में एक सवाल बार-बार उठता है—“मेरे साथ ही ऐसा क्यों?

यही सवाल अगर लंबे समय तक मन में बना रहे तो धीरे-धीरे वह शिकायत में बदल जाता है और शिकायत कुंठा में।

कुंठा हमें दुखी कैसे करती है?

मान लीजिए किसी व्यक्ति ने आपका अपमान किया। घटना कुछ मिनट की थी, लेकिन आपने उसे अपने मन में महीनों तक संभालकर रखा। आप बार-बार उस घटना को याद करते हैं। सोचते हैं कि उसने ऐसा क्यों कहा, मुझे उसका जवाब देना चाहिए था, उसने मेरे साथ गलत किया। वह व्यक्ति शायद अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुका है, लेकिन आप अभी भी उसी घटना के भीतर फंसे हुए हैं।

यानी घटना खत्म हो गई, लेकिन उसका प्रभाव आपने अपने भीतर जीवित रखा। यहीं से मन का बोझ बढ़ने लगता है।

अपेक्षाएं भी कुंठा का बड़ा कारण हैं

हम दूसरों से जितनी ज्यादा अपेक्षाएं रखते हैं, निराश होने की संभावना भी उतनी ही बढ़ जाती है।हम चाहते हैं कि पति हमें समझे, बच्चे हमारी बात मानें, दोस्त हमारा साथ दें, परिवार हमारी मेहनत को पहचाने और समाज हमें सम्मान दे।

लेकिन हर इंसान हमारी अपेक्षाओं के अनुसार व्यवहार करे, यह संभव नहीं है। इसलिए जीवन में एक महत्वपूर्ण बात सीखनी पड़ती है

अपेक्षा कम करना और संवाद बढ़ाना

इसका मतलब यह नहीं कि हमें रिश्तों में कुछ मांगना ही नहीं चाहिए। बल्कि इसका अर्थ है कि अपनी खुशी की पूरी जिम्मेदारी दूसरे व्यक्ति के व्यवहार पर नहीं छोड़नी चाहिए।तुलना भी मन को बीमार करती हैआज सोशल मीडिया ने तुलना को और बढ़ा दिया है।

हम किसी की खूबसूरत तस्वीर देखते हैं और अपने जीवन को उससे तुलना करने लगते हैं। किसी की नौकरी, किसी का घर, किसी की गाड़ी, किसी की सफलता देखकर हमें लगता है कि हम पीछे रह गए।लेकिन हम भूल जाते हैं कि हम दूसरे व्यक्ति की जिंदगी का सिर्फ दिखाई देने वाला हिस्सा देख रहे हैं। हर व्यक्ति के जीवन में अपनी परेशानियां होती हैं।

इसलिए तुलना करने के बजाय खुद से पूछिए—“क्या मैं कल से आज थोड़ा बेहतर हूं?”यही तुलना सबसे स्वस्थ तुलना है।

दबा हुआ गुस्सा भी बोझ बन जाता है

कई लोग गुस्सा व्यक्त नहीं करते। वे सब सहते जाते हैं।

बाहर से कहते हैं—“कोई बात नहीं।

”लेकिन अंदर से कहते हैं—“मुझे बहुत बुरा लगा।

”हर बात को दबाते रहना भी समाधान नहीं है।

अपनी भावनाओं को स्वस्थ तरीके से व्यक्त करना जरूरी है। किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करना, डायरी लिखना, टहलना, ध्यान करना या जरूरत पड़ने पर किसी मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना मददगार हो सकता है।

क्या कुंठाएं बीमारियों का कारण बनती हैं?

यह कहना सही नहीं होगा कि हर बीमारी की वजह कुंठा होती है।बीमारियों के पीछे कई कारण हो सकते हैं—आनुवंशिकता, संक्रमण, खान-पान, जीवनशैली, उम्र, नींद और पर्यावरण आदि।

लेकिन लंबे समय तक बना रहने वाला तनाव शरीर पर असर डाल सकता है। यह नींद, पाचन, रक्तचाप और मानसिक स्वास्थ्य जैसी चीजों को प्रभावित कर सकता है।

इसलिए मन की परेशानियों को भी उतनी ही गंभीरता से लेना चाहिए जितनी हम शरीर की परेशानियों को लेते हैं।

फिर कुंठा से बाहर कैसे निकलें?

सबसे पहले खुद से ईमानदारी से पूछिए—

मुझे वास्तव में दुख किस बात का है?

क्या मुझे किसी व्यक्ति से शिकायत है?

क्या मेरी कोई अपेक्षा पूरी नहीं हुई?

क्या मैं किसी से अपनी तुलना कर रही हूं?

क्या मुझे किसी पुराने अनुभव का दर्द आज भी परेशान करता है?

या फिर मैं खुद से ही बहुत ज्यादा अपेक्षाएं कर रही हूं?

जब कारण समझ में आने लगता है, तब समाधान की शुरुआत होती है।

जो चीज आपके नियंत्रण में है, उस पर काम कीजिए।

जो आपके नियंत्रण में नहीं है, उसे स्वीकार करना सीखिए।

हर व्यक्ति को बदलना आपकी जिम्मेदारी नहीं है।

हर रिश्ते को बचाना आपकी जिम्मेदारी नहीं है।

हर व्यक्ति से मान्यता लेना भी जरूरी नहीं है।

कभी-कभी खुद को यह कहना भी जरूरी होता है—

“मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। अब मुझे खुद को भी शांति देने का अधिकार है।”

अंत में…

जीवन में दुख आएंगे। लोग निराश करेंगे। कुछ रिश्ते टूटेंगे। कुछ सपने पूरे नहीं होंगे। कभी सम्मान मिलेगा, कभी नहीं मिलेगा।

लेकिन इन घटनाओं को अपने पूरे जीवन का बोझ बना लेना जरूरी नहीं है।

मन में जमा शिकायतों को धीरे-धीरे छोड़ना सीखिए।

माफ करना हमेशा दूसरे व्यक्ति के लिए नहीं होता। कई बार माफी का अर्थ होता है—अपने मन को उस घटना की कैद से आजाद करना।

क्योंकि जिंदगी बहुत छोटी है।

हर दिन पुराने दुख को ढोने के लिए नहीं, बल्कि आज को जीने के लिए है।

याद रखिए—

«“हर दुख परिस्थिति से नहीं आता। कुछ दुख हमारी अपनी अपेक्षाओं, तुलनाओं और मन में जमा कुंठाओं से पैदा होते हैं। इसलिए जीवन को बदलने से पहले कभी-कभी अपने भीतर जमा बोझ को हल्का करना जरूरी होता है।”

»— रेखा भंडारी “नीर”

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