कोलकाता में बोले आरएसएस प्रमुख, कहा भारतीय संस्कृति के सम्मान तक बना रहेगा हिंदू राष्ट्र
कोलकाता: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत को हिंदू राष्ट्र बताते हुए कहा कि इसके लिए किसी प्रकार के संवैधानिक प्रमाण की जरूरत नहीं है। कोलकाता में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भारत अपनी सांस्कृतिक पहचान के कारण हिंदू राष्ट्र है और जब तक इस देश में भारतीय संस्कृति का सम्मान किया जाता रहेगा, तब तक भारत हिंदू राष्ट्र बना रहेगा।
मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि “हिंदू” कोई संकीर्ण धार्मिक पहचान नहीं है, बल्कि यह जीवन पद्धति और संस्कृति का प्रतीक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की आत्मा उसकी प्राचीन सभ्यता, परंपराएं और सांस्कृतिक मूल्यों में बसती है, जो हजारों वर्षों से इस देश की पहचान रही है। इसी सांस्कृतिक निरंतरता के कारण भारत को हिंदू राष्ट्र कहा जाता है।

सरसंघचालक ने जाति व्यवस्था के मुद्दे पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जन्म के आधार पर बनी जाति व्यवस्था हिंदुत्व की पहचान नहीं है। भागवत ने जोर देते हुए कहा कि समाज में भेदभाव और ऊंच-नीच की भावना भारतीय संस्कृति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि हिंदुत्व सभी को समान मानने और समाज को जोड़ने की बात करता है, न कि बांटने की।
उन्होंने यह भी कहा कि समय के साथ समाज में आई कुरीतियों को ही धर्म और परंपरा का नाम दे दिया गया, जबकि वास्तव में भारतीय संस्कृति का मूल स्वरूप समरसता, सह-अस्तित्व और एकता पर आधारित है। भागवत ने समाज से अपील की कि वह भारतीय संस्कृति के मूल मूल्यों को समझे और उन्हें अपनाए।

कार्यक्रम के दौरान मोहन भागवत ने यह संदेश भी दिया कि भारत की पहचान किसी एक कानून या दस्तावेज से नहीं, बल्कि यहां के लोगों के आचरण, सोच और सांस्कृतिक चेतना से बनती है। उन्होंने कहा कि यदि भारतीय समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा रहेगा, तो देश की एकता और अखंडता और अधिक मजबूत होगी।
उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। समर्थक इसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति बता रहे हैं, जबकि आलोचक इसे संवैधानिक मूल्यों से जोड़कर देख रहे हैं। फिलहाल, मोहन भागवत का यह बयान एक बार फिर भारत की पहचान, संस्कृति और समाज की संरचना पर बहस को केंद्र में ले आया है।
